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काशी- मुक्ति की जन्मभूमि

मुक्ति की जन्म- काशी


आस्था का केंद्र बिंदू और आराध्य के प्रति संकल्पित समपंण, पुष्प, चंदन, अगरबत्ती, शाकल्य, फूल- माला, इत्र की सुगंध और आराध्य की विरुदावली का वाचन- गायन- कीर्तन, गीत- संगीत से युक्त देवस्थान जहाँ जिंदगी जीने की अभिलाषा ही सब कुछ है, वहीं श्मशान ऐसी जगह है, जहाँ चिता पर धू- धू जलते शवों की सड़ांध या दुर्गन्ध, रुदन- क्रंदन, भयानक और वीभत्स रस की संचारी प्रवृतियाँ, जीवन की नश्वरता पर व्यंग्यात्मक अट्टहास करती हैं। जीवन और मृत्यू को समभाव से स्वीकार करने वाली, काशी में देवस्थान और श्मशान एक समान हैं, एक साथ हैं। चक्र पुष्करिणी, मणिकर्णिका, चरणपादुका जैसे पवित्र स्थल पर श्मशान नाथ के चरण स्पर्श करती गंगा के तट पर स्थित काशी का मणिकर्णिका मरघट श्मशान ही नहीं, महाश्मशान है, जहाँ चिता की आग पर लिट्टी सेंक कर खायी जाती हो, जहाँ शव जलाने और भोजन करने का काम साथ- साथ होता हो, जहाँ आगंतुक को ज्ञान- वैराग्य की प्राप्ति होती हो और जो सिद्धों की साधना- स्थली और सिद्धि का स्रोत हो, वहाँ सचमुच मरण भी मंगल है।
सामान्यतया मानव जीवन से मुक्ति कोई प्रिय प्रसंग नहीं है, किंतु ईश्वर प्रणीत, हमारे धर्मग्रंथों से लेकर ॠषियों- महर्षियों, महात्मा और साधु- संतों, सबने जीवन से मुक्ति या मोक्ष की शाश्वत् अभिलाषा व्यक्त की है। संसार नश्वर है और जन्म लेने वाला मरेगा ही, इस सर्वजनीन और सर्वकालिक सत्य को भी नकारने का कोई सवाल नहीं। फिर मरने के बाद का सवाल भी मनुष्य के मन को कुरेदता रहता है। जिसने संसार को आनंद- कानन माना और जीवन को भोगने की भावना से जिया, जिसने सांसारिक माया और ममता में पड़ कर, इस देह की नश्वरता की परवाह नहीं की, उसके लिए मोक्ष चिंता की बात नहीं है। किंतु जिन्होंने सांसारिकता के काले पक्ष को झेला और दुनिया के रुदन, क्रंदन, पीड़ा, दु:ख- दैन्य, कष्ट, कराह की नारकीय जिंदगी देखी है-- वे विभिन्न योनियों में भटकने और पुनर्जन्म की प्रतारणा से मुक्ति के अभिलाषा को काशी पूरा करती है।

हमारे शास्रों में तीन काशी -- उत्तर काशी, दक्षिण काशी और काशी का उल्लेख है, किंतु आदि शंकराचार्य ने "सा काशी काहं निजबोध रुपा...' कह कर जिस आध्यात्मिक काशी का उल्लेख किया है, वह उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर वरुणा और असि नदियों के बीच स्थित काशी ही है। काशी खंड के ४२ वें अध्याय में उसी काशी का उल्लेख है, जो गंगा तट पर स्थित विश्वनाथ की नगरी है और जिसके विषय में ""काश्यां मरणान् मुक्ति:'' की बात कही जाती है :

असारे खलु संसारे सारमेतत् चतुष्टयम्।
काश्याम् वासः सत्संगः गंगाभ्यः शम्भुपूजनम्।।

ब्रह्मा जी ने स्पष्ट कहा है कि दुनिया भर की बातों को छोड़कर तत्व की बात यह है कि जो प्राणी काशी में अपना शरीर त्यागता है, उसे मुक्ति प्राप्त होती है :-

निर्भेद्य विश्व, वाग्जालं सारभूतमिदं परम।
ब्रह्मणोक्त मिदं पूवर्ं काश्यां मुक्तिस्तुनुत्यजामं।।


वाल्मीकि रामायण में भी इसी कथ्य की पुष्टि की गयी है --

तद्भवानद्य काशेयपुरी वाराणसी ब्रज,
रमणीयां त्वयागुप्तां सुप्रकाशं सुतोरणाम्।

मानस में भी तुलसीदास ने भूतभावन भगवान विश्वनाथ की ही काशी में निवास का महत्व प्रतिपादित किया है।

मुक्ति जन्म महि जान खानि अघ हानि कर।
जँह बस शम्भु भवानि सौ काशी सेइअ कस न।




काशी : मुक्ति की जन्मभूमि

आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने काशी को मुक्ति की जन्म- भूमि कहा है। उन्होंने लिखा है-- ""काशी मुक्ति की जन्म- भूमि है। यहीं मुक्ति ने सबसे पहले जन्म लिया था।'' काशी खण्ड के ३३ वें अध्याय के अन्र्तगत उत्पत्ति माहात्म्य की चर्चा है। उसमें ज्ञानवापी मण्डप का जो स्वरुप वर्णित किया गया है, ""मुक्ति मंडप'' को उसका एक प्रमुख अंग बताया गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि इस असाधारण तीर्थ का, जहाँ मरण ही मंगल माना जाता है, श्मशान साधारण मरघट कैसे हो सकता है, उसका महाश्मशान होना ही समीचीन और स्वाभाविक है। कहा है --

मरणं मंगलम् यत्र सफलम् यत्र जीवितम्।
स्वर्ग स्मृणायते यत्र सैषो श्रीमणिकर्णिका।।

विश्व में शायद ही कोई ऐसा स्थान हो जहाँ लोग मरने के लिए आते हों। काशी के रैन- बसेरे, मोक्ष- भवन, स्वर्गाश्रम, संन्यास आश्रम, मुमुक्ष भवन आदि के साथ ही घाटों के किनारे देश भर के भूतपूर्व राजाओं- महाराजाओं की दशाब्दियों पूर्व निर्मित कोठियाँ इतिहास के इसी पहलू को उजागर करती है। जाहिर है कि जीवन की सांघ्य बेला में राजा से रंक तक मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए इस महाश्मशान की ही शरण में आते हैं।

मणिकर्णिका तीर्थ स्थित इस महाश्मशान पर स्थापित श्मशाननाथ का शिवलिंग, जिसके चारों तरफ चाँदी की मुण्डमालाएँ बनी हैं, इसे और अधिक प्रामाणिक बनाता है। इसी तीर्थ की वंदना में कहा गया है कि --

विश्वेशं, माधवं ढुपिढं दण्डपाणिं च भैरवम्।
वन्दे काशी गुहां गंगा भवानी मणिकर्णिकाम्।।

इस संबंध में काशी तीर्थपुरोहित सभा वाराणसी के अध्यक्ष पं. अंजनी नंदन मिश्र ने "जाबाल्योपनिषद' की व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा है कि भगवान शंकर के त्रिशूल पर स्थित काशीपुरी के महाश्मशान में प्राण त्यागने वाला जीव शिव को ही पाता है, यही आदेश, उपदेश और परम धर्म है --

त्रिशूल मां काशीमधिश्रित्यक्ता सर्वो
पिययेवसविशन्ति एष- एवादेशः एष
एवं उपदेशः। एष एवं परमोधर्मः।

(जाबाल्योपनिषद्)


किंतु आज के आदमी का विश्वास इस व्यवस्था पर नहीं जमता, ऐसा क्यों है ? इसके उत्तर में श्री मिश्र ने कहा, यह सब बातें अति सूक्ष्म होने के कारण आजकल की भौतिक चकाचौंध में गले के नीचे उतरती नहीं। इसके लिए गूढ़ आस्था और विश्वास की परम आवश्यकता है।

स्कंद पुराणान्तर्गत काशी खण्ड के २६ वें अध्याय में भगवान शंकर द्वारा माँ अन्नपूर्णा को सुनायी गयी कथा को स्कंद ॠषि ने अगस्त्य जी को बताते हुए स्पष्ट कर दिया है कि शिव ही सृष्टि के आदि रचनाकार हैं। उन्हें औघड़दानी, भोलेनाथ, बम भोले आदि नामों से लोक जीवन में जाना जाता है और ऐसी मान्यता है कि निष्ठापूर्ण ध्यान और पूजन से भोले नाथ जल्दी ही रीझ जाते हैं। वरदानी तो वे ऐसे हैं कि भस्मासुर पैदा करने की परंपरा उन्होंने डाल दी। भला काम करने वाले को तो, अन्यंत्र भी मोक्ष मिलता है, किंतु काशी में सभी प्रकार के प्राणियों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

काशी में पाप करके मरने वालों को शंकर जी के साथ रुद्रपिशाच बनकर रहना पड़ता है। भूत भावन के साथ भूत- प्रेतों की मण्डली तो रहेगी ही। स्वाभाविक है कि उनके लिए सामान्य श्मशान नहीं, महाश्मशान की परिकल्पना हो। शिव और शक्ति के साधक औघड़ों के कर्म क्षेत्र भी तो ये श्मशान ही हैं। काशी का यह महाश्मशान भगवान विश्वनाथ के वीभत्स पौरुष का स्थायी रंगमंच है। जिस श्मशान में रुद्र का निवास हो, वह सामान्य श्मशान तो होगा नहीं।

वैदिक महासंकल्प में भी काशी को महाश्मशान कहा गया है। इस संकल्प में वाराणसी क्षेत्र को अविमुक्त, महाश्मशान, आनंदवन इत्यादि कहा गया है। हमारे पुराण और उपनिषद् इस बात के साक्षी हैं कि काशी भगवान शंकर के त्रिशूल पर स्थित है।

क्षेत्रमेतत् त्रिशूलाग्रे- शूलिनः स्तिष्ठति द्विजः
अंतरिक्षेस भू इष्ठ - नेक्षते मूढं बुद्धयः
(स्कन्दपुराण- का०ख०अ०२२-१८५ )

""हे द्विज ! यह क्षेत्र ( काशी ) भगवान शंकर के त्रिशूल के अग्रभाग में स्थित है, जो पृथ्वी पर न होकर अंतरिक्ष में है, थोथी बुद्धिवाले मूढ़ जन इसको इस चर्म चक्षु से नहीं देख सकते।'' इस व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि काशी दिव्य- शक्ति- संपन्न नगरी रही है।



महाश्मशान : मणिकर्णिका का पर्याय



काशी को महाश्मशान कहा गया है। स्वभावतः जहाँ अधिक लाशें जलायी या प्रवाहित होती हो, उसे महाश्मशान कहेंगे। सच भी है कि काशी के मणिकर्णिका मरघट पर कभी ऐसा नहीं देखा गया, जब चिता की अग्नि प्रज्जवलित न हो। जहाँ दिन- रात शव जलते हो, उसे सामान्य रुप से महाश्मशान कहेंगे ही, किंतु कलकत्ता, बंबई, दिल्ली आदि महानगरियों में भी तो श्मशानों में रात- दिन शवदाह होते रहते हैं, फिर भी उन्हें महाश्मशान की संज्ञा नहीं मिली, क्योंकि इन शहरों को काशी जैसा गौरव प्राप्त नहीं है। भारत खण्ड में कुल साढ़े तीन महाश्मशान माने गये हैं। एक हैं रामेश्वरम् में, दूसरा द्वारिका में और तीसरा है काशी का महाश्मशान। मथुरा के लघु श्मशान को भी महाश्मशान माना गया है। हमारे शास्रों में कहा गया है कि :

वाराणसीति काशीति रुद्रावास इति द्विज
महाश्मशान मित्ये वं प्रोक्तमाननन्दकाननम्

महाश्मशान की व्याख्या करते हुए भगवान स्कंद ने स्वयम् कहा है कि हे मुने ! शब्दों के अर्थवेत्ता लोग शब्द का अर्थ मुर्दा शव और शान शब्द का अर्थ "शयन' कहते हैं। इसलिए जहाँ मुर्दे शयन करें, उसको श्मशान कहते हैं। प्रलय काल प्राप्त होने पर महाभूतगण जहाँ पर शव होकर शयन करते हैं, उस स्थान को महाश्मशान कहते हैं।

काशी स्वर्ग है, क्योंकि वह अविमुक्त क्षेत्र है। शंकर के त्रिशूल पर शून्य में स्थित है। हम किसी के निधन को स्वर्गवास या काशीवास कहते हैं। हमारे पुराण- पुरुषों ने तो समस्त काशी को ही महाश्मशान माना था और यही कारण था कि गृहस्थ लोग काशी के अंदर निवास नहीं करते थे। कभी यह श्मशान चौक थाने के पास मंदाकिनी गंगा के बीच उस स्थान पर स्थित था, जहाँ श्मशानेश्वर महादेव का मंदिर है। आबादी के विस्तार के साथ यह सिमटता- सिमटता मणिकर्णिका तीर्थ पर पहुँच कर और अधिक महत्व पा गया। काशी के इस महाश्मशान का आध्यात्मिक महत्व इसलिए और अधिक है कि यह उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर स्थित है।

सर्वत्र गंगा उत्तर से दक्षिण बहती है, किंतु यहाँ वह दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। यह श्मशान गंगा तट के उस भाग में स्थित है, जहाँ गंगा का स्वरुप दूज के उस चंद्रमा- सा है, जो भगवान शंकर के ललाट पर स्थित है और जिसे भगवान शंकर और विष्णु, दोनों की तपोभूमि होने का सौभाग्य प्राप्त है।



मोक्ष- प्राप्ति : एक अंतर्कथा

स्कंद पुराण की कथा है कि शिव एवं शिवानी ने काशी में मरने वालों को मोक्ष प्रदान करने का कार्य अपने जिम्मे रखकर सृष्टि रचना का कार्य किसी और के हवाले करने का निश्चय किया। भगवान शंकर ने अपनी अमृतवर्षिणी दृष्टि बायीं तरफ फेरी। परिणामतः तीनों लोकों में सबसे सुंदर आलोक पुरुष का उदय हुआ। बाबा विश्वनाथ ने उसे विष्णु नाम से संबोधित किया और जगत की रचना, परिपालन एवं विनाश का कार्य उन्हें सुपुर्द कर आनंद कानन में प्रवेश कर गये।
विष्णु ने उसी स्थान पर अपने चक्र से एक सुंदर पुष्करिणी ( पोखरी ) खोदी एवं अपने शरीर से निकले स्वेद बिंदु ( पसीने ) से उसे भर दिया। वहीं उन्होंने घोर तपस्या की, जिससे प्रभावित हो शिव एवं पार्वती प्रकट हुए। विष्णु को उन्होंने वरदान दिया कि तुम्हारी तपस्या- स्थली एक अत्यंत पवित्र तीर्थ- स्थल बनेगी। तुम्हारे उग्र तप को देख मेरा मस्तक हिल उठा और मेरा सर्पाकृत मणिकुण्डल इस स्थान पर कान से गिर पड़ा। अतः इस तीर्थ का नाम आज से मणिकर्णिका होगा। महेश्वर ने उस पोखरे का नाम, जिसकी खुदाई अपने चक्र से विष्णु ने की थी, चक्र पुष्करिणी तीर्थ रखा। भगवान विष्णु ने गिरजा वल्लभ से कुछ वर माँगे, जिसमें उन्होंने मणिकर्णिका को मुक्ति- क्षेत्र करने और इस खण्ड का नाम काशी रखने की प्रार्थना की। मणिकर्णिका पर विभिन्न प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान करने वालों को अक्षय मोक्ष को उपलब्धि का वरदान भी विष्णु ने मांगा। देवाधिदेव महादेव ने "एवमस्तु' कह कर इसे अक्षय मोक्ष और मुक्ति- लक्ष्मी का निवास होने का वरदान दिया।

काशी में मणिकर्णिका के अतिरिक्त हरिश्चंद्र घाट का श्मशान भी है। यह सूर्य वंशी चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा भूमि के रुप में भी विख्यात है। महाराजा हरिश्चंद्र ने विश्वामित्र को अपनी सारी पृथ्वी दान में देने के बाद काशी में आकर इसलिए शरण ली कि यह उनके द्वारा दान दी गई भूमि त्रैलोक्य से अलग थी। यहाँ भी सत्यवादी हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी और अपने को इस महाश्मशान के डोमराजा के हाथ बेचकर, अपनी सत्यवादिता का परिचय दिया। जिस मरघट पर मुखाग्नि की आग देने वाला डोम भी राजा की उपाधि से विभूषित हो, जहाँ सत्यवादी हरिश्चंद्र जैसे राजा ने लाशों को फूँकने का काम किया हो, वह सामान्य श्मशान नहीं माना जा सकता।

पूर्वी उत्तरप्रदेश और पश्चिमी बिहार के लोग मणिकर्णिका महाश्मशान को काशी से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। उनकी मान्यता ""काश्यां मरणान् मुक्ति'' की सीमा से परे है। यहाँ के लोक मानस की धारणा है कि मनुष्य कहीं भी मरे, यदि उसका शवदाह काशी में होता है, तो भी उसका मोक्ष हो जाता है। यही कारण है कि वाराणसी के आस- पास के जनपदों के समर्थ लोग वाहनों द्वारा शव काशी लाते हैं और मणिकर्णिका पर शवदाह करते हैं। राम- नाम सत्य है, हरि बोल, जय श्री राम, सत श्री अकाल आदि बोध- ध्वनियों से गुंजित, प्रतिदिन यहाँ पहुँचने वाली शव यात्राएँ इस तथ्य का प्रतीक है कि देश के हर भाग, संप्रदाय के लोग इसी महाश्मशान पर आते हैं।
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